आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत

पैरोडी के शास्त्रीय निहितार्थ
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पैरोडी को हास्य की एक समृद्ध विधा माना गया है । पैरोडी अर्थात नकल-अनुकृति मिमिक्री ;शब्द, भाव, भाषा, स्थिति और ध्वनि की हो सकती है । नकल को हास्य का जनक भी कहा गया ।पाश्चात्य देशों में इसे Burlesque 'बर्लेस्क'कहा गया अर्थात साहित्य, संगीत, नाटक आदि के अंतर्गत हास्यास्पद प्रयोग । 'बर्लेस्क' इतावली  'बर्लेस्को' से निकला है , जो बदले में इतावली 'बुर्ला' से लिया गया है,जो हास- परिहास-उपहास से संबंधित है।
'बर्लेस्क' को कैरीकेचर और पैरोडी के व्यापक अर्थ में भी लिया जाता है। पैरोडी में किसी भी विशिष्ट शैली या लेखक की ऐसी हास्यास्पद नकल- अनुकृति होती है जो गंभीर भावों को हास्य में परिवर्तित कर देती है ।
ऑर्थर साइमन जैसे विद्वान पैरोडी के बारे में लिखते हैं कि Love-Admire and Respect  the original admiration and Laughter is the very essance of the act of art of Parody अर्थात पैरोडी में मूल के प्रति प्रेम और आदर में कमी नहीं आनी चाहिए। अच्छी पैरोडी का सौंदर्य उसकी मूल रचना से घनिष्ठता है ।
यह तीन प्रकार की होती है। शब्द , आकार और भावना संबंधी । पैरोडी का एक और भी कार्य है। हास्य उसका अस्त्र होने के कारण गंभीर विषय के स्थान पर उसका हास्यास्पद विषय चुना जाता है,जो यूं ही सारी रचना को मज़ाकिया बना देता है ।अलेक्जेंडर पोप की 'द रेप ऑफ द लॉक' ( 1712- 1714) और 17 वीं शताब्दी में ही सैमुअल बटलर की'हुडीब्रास' नकली वीर कथात्मक कविता, जिसमें संसदीय व्यवस्थाओं पर व्यंग्य है ' जैसे पाश्चात्य साहित्य में  उदाहरण देखने को मिलते हैं, किंतु ऐसे उदाहरण उंगली पर गिनने जितने ही हैं । हास्य के अन्य प्रयोगों- तत्वों और विधाओं की तुलना में  दुनिया में पैरोडी बहुत कम ही लिखी गई है । यह रोचक और जानने योग्य है कि राजस्थान के ही  चारण कवियों ने 'पृथ्वीराज रासो' पर आधारित एक पैरोडी 'सियार रासो' लिखी । राजस्थान के जोधपुर के बड़लिया गांव के लगभग 60 चारण परिवारों( कवियों)ने एक नापित (नाई) द्वारा एक हड़के सियार को मारने पर स्वयं नाई के प्रशंसापेक्षी होने पर आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व अर्थात 1822 में यह 'सियार रासो' लिखी। एक  यह अद्भुत- अद्वितीय पैरोडी सिद्ध हुई।स्वयं चारण परिवारों द्वारा सियार को मारने में असफल रहने और एक नाई द्वारा हड़के सियार के शिकार को  चारण कवियों द्वारा  अतिशयोक्तिपूर्ण ओज के माध्यम से प्रस्तुत किया गया ,जो भारत की 'रेप ऑफ द लॉक' सिद्ध हुई ।
यथाश्रुति पहली बार बच्चन जी ने दिसंबर 1933 में शिवाजी हाल काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पहली बार 'मधुशाला' सुनाई । प्रोफेसर मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने अपने संस्मरण में इसका उल्लेख किया। उन्होंने भी 'मधुशाला' की पैरोडी लिखी । सर्वाधिक पैरोड़ियाँ 'मधुशाला' की ही लिखी गईं। 'चरखाशाला' 'सिगरेटशाला' 'गौशाला' 'चट शाला ' 'विजयाशाला' आदि-आदि । सही अर्थों में हरिवंश राय बच्चन जी की दो ही श्रेष्ठ रचनाएं मानी  गईं । 'मधुशाला' और 'अमिताभ बच्चन'...और दोनों की ही खूब पैरोडी हुई ... अस्तु । भारत में मधुशाला को पैरोडियों की आधिकारिक  जननी भी कहा जा सकता है ।मधुशाला के बाद जिसकी सर्वाधिक पैरोडी हुई, वो नीरज जी के गीत "कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे", (1966 )की हुई । इक्की- दुक्की रचनाओं को छोड़कर पैरोडियां हास्य उत्पन्न करने में असफल रहीं; क्योंकि अधिक उदारता वाली- प्रत्याशित और श्रद्धावर्धक नकल भी हास्य उत्पन्न नहीं कर पाती है।
भारत में सही अर्थों में   विशुद्ध हास्य रस पर आधारित सिचुएशनल पैरोडियों का जनक  हरिशंकर परसाई  जी को माना जाना चाहिए । उन्होंने यह प्रयोग सर्वप्रथम 'बीमार मुक्तिबोध और हम' नामक एक निबंध में किया ।इस रचना का सृजन तब हुआ ,जब; पक्षाघात से पीड़ित मुक्तिबोध चिकित्साधीन थे।  वे तत्कालीन प्रसिद्ध कवि प्रभाकर माचवे, मैथिलीशरण गुप्त, जैनेंद्र कुमार, माखनलाल चतुर्वेदी , अमृत राय, ख्वाज़ा अहमद अब्बास और सोहन सिंह जोश जैसे कवियों की शैली का सफल अनुकरण करते हुए सिचुएशनल पैरोडी लिखते हैं-
प्रभाकर माचवे
सुन रहा हूँ, हो गए तुम बंधुवर बीमार
याद है उज्जैन, शिप्रा, महाकालेश्वर 
नहीं गए कभी रामेश्वर,
 लंदन, टोरंटो, पेरिस ,न्यूयॉर्क, बुडापेस्ट जाओगे- जाओगे मेक नो हेस्ट
 किया था न्यूयॉर्क से 2 घंटे का काव्य पाठ बात है, खूब है, इमेज और  ठाठ
 तुम बीमार हो सुनकर दुःखी हम 
TWEEDLEDUM-TWEEDLEDUM
मैथिलीशरण गुप्त
 रोग,शोक,आदि व्याधि का ,घर है मानव देह   हे  राम उसे चंगा करो,  बरसा    औषध     मेह
माखनलाल चतुर्वेदी
मेरे कवि, मेरे मनमोहन, मेरी मनुहारों और दुलारों के देवता, जिसकी सूझें पांव पसारे प्रतिपल आकाश में उड़ रही हैं 
जिसका ईमान पीढ़ियों को बदल दे रहा है जिसके बोल
 कोटि-कोटि
 कंठों  की जवानी 
गा रही है
 वह दुलारा कवि बीमार है 
बस जल्दी अच्छा हो और
 तरुणाई के सपने संजोए
ख्वाज़ा अहमद अब्बास
शायर बीमार है, कवि बीमार है,
 जनता का शायर बीमार है 
कवि बीमार है
 भूखी जनता, नंगी जनता, बेघर जनता,
 बेसर जनता, बेपर जनता का शायर बीमार है... इसके बाद ऐसे अनेक नाम काव्य मंचों पर आए ,जिन्होंने पैरोडी की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए ।
1961 में भोपाल के राकेश वर्मा 'हैरत' ने "तेरी प्यारी -प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे" की तर्ज पर "इन प्यारी- प्यारी किताबों को किसी की नज़र ना लगे" लिखी,  जो जबलपुर के एक कॉलेज में पढ़ी गई । राकेश वर्मा पैरोडियों के माध्यम से धीरे-धीरे लोकप्रिय हुए । यह सुखद आश्चर्य है कि वो 1990 में काव्य मंचों पर सक्रिय हुए । कदाचित यह रेखांकित किए जाने योग्य है कि भारत में पैरोडी पर एक -आध पुस्तक ही लिखी गई हैं । उनमें 2003 में प्रकाशित "ढूंढ रहे भिन्नाय" महत्वपूर्ण है; जो कि राकेश वर्मा जी द्वारा ही लिखित है ।
1968 में राजस्थान के वरुण चतुर्वेदी जी ने पैरोडी लिखी "ओ मैया दौड़ कर आओ, मुझे मच्छर ने काटा है( बहारों फूल बरसाओ की तर्ज़ पर ) मंच पर पैरोडी स्थापित करने में इनका नाम आदर से लिया जाता है।
आदित्य जी ने "ओम् जय जगदीश हरे "की पैरोडी ,नोट देव की आरती से की 
अल्हड़ जी ने भजन "दाता एक राम" की पैरोडी की ।
जैमिनी हरियाणवी जी ने "तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस का "इस फ़िल्मी गाने की पैरोडी लिखी ।
"तू बावन बरस की ,मैं बासठ बरस का"। यह 70 से 80 का दशक था, जब वाचिक परंपरा के प्रतिष्ठित कवियों ने पैरोडी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
कवियों का कैसा हो बसंत
 कवि- कवयित्री कहती पुकार
 कवि सम्मेलन का मिला तार
 शेविंग कर के, कर के सिंगार 
देखो कैसी होती उडंत 
कवियों का कैसा हो बसंत ।
बेढ़ब  बनारसी ने  सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता ..वीरों का कैसा हो बसंत पर आधारित  पैरोडी लिखी)
राजस्थान के ही विश्वनाथ विमलेशजी ने सन 1975 में फिल्म 'जूली' पर आधारित पैरोडी लिखकर सबको चौंकाया और यह सिद्ध किया कि इस विधा में भी उनको महारत हासिल है । उनकी  भजन आधारित एक पैरोडी ,"मैया मोहे फखरू बहुत खिझायो" ने पैरोडी के मानक स्थापित किए ।
सिचुएशनल पैरोडी का प्रभावी  प्रयोग ओम प्रकाश आदित्य  जी ने किया और उन्होंने लगभग 77-78 में कालजयी सिचुएशनल पैरोडी "गोरी बैठी छत्त पर"..लिखी ।1978 में ही रामबाबू सिकरवार ने "तेरे दर पे आया हूँ," गीत पर आधारित पैरोडी लिखी । 1980 में  हास्य कवि आशकरण अटल जी ने 'आशिक की पिटाई और कवियों की गवाही' नामक पैरोडी लिखी। विभिन्न रसों के प्रयोगों ने इसे  रससिद्ध पैरोडी बना दिया ।
विश्वेश्वर शर्मा  जी  की वृद्धावस्था और नए गानों पर उनकी पैरोडियों के मिसमैच से उत्पन्न हास्य ने उनको पैरोडी स्टार बना दिया । यह ज्ञात रहे विश्वेश्वर जी मूलत्:  एक गीतकार ही थे ।उन्होंने भी1981 के आस पास ही पैरोडी लिखना शुरू किया । 1982 में हास्य कवि पदम अलबेला ने पैरोडी का सफल प्रयोग किया ।" कौन सी दफा में लेकर आया रे सिपहिया" (फिल्म नदिया के पार के   लोकप्रिय गीत "कोन दिसा में लेके" पर आधारित)
1984- 85 के आसपास अलबेला खत्री का नाम उभरा; जिसने लिखा, "दो साल पहले मैं बेरोजगार था ,आज भी हूँ और कल भी रहूँगा... उनकी पैरोडी  अर्थवत्ता को लेकर सर्व स्वीकार्य बन गई।कवयित्रियों में कुसुम जोशी ने भी पैरोडी के कुछ प्रयोग किये ।
90 के दशक के बाद नई पीढ़ी मंचों पर आई, जिसने सिचुएशनल पैरोडी को महत्व दिया। इनमें संजय झाला की 'गोरे -गोरे गाल मेरे मैं क्या करूं'(ख़ाकसार  ये गर्व से लिख रहा है कि आदरणीय उर्मिलेश जी ने इस सिचुएशनल पैरोडी के लिए कहा था कि "तुम्हें जीवित रखने के लिए यह रचना काफी है), आशीष अनल  की 'बेनज़ीर की होली' पर आधारित पैरोडी और डॉ.प्रवीण शुक्ल की 'स्वयंवर में कविगण'तथा किरण जोशी,सबरस मुरसानी भी इसमें सम्मिलित हैं । इसी पीढ़ी के एकेश पार्थ ने  विशुद्ध फिल्मी गीतों पर लिखीं ,जो खूब चर्चित रहीं ।इसके बाद  ऊर्जावान  पीढ़ी  आई ,जो आज भी पैरोडी लेखन में सतत सक्रिय है और जिनसे बहुत आशाएं हैं, उनमें कैलाश मंडेला, सुदीप भोला, पार्थ नवीन, शैलेंद्र शैलू ,ये सभी नए विषयों-गानों पर पूरी ऊर्जा के साथ नया और मौलिक लिख रहे हैं , किंतु आज भी पैरोडी का हास्य के श्रेष्ठि वर्ग में सम्मिलित होना शेष है, क्योंकि पैरोडी पर विमर्श- प्रकाशन बहुत कम हुआ है । संभव है नई पीढ़ी भी यह मानती है कि पैरोडी की उम्र मंचो तक सीमित है, किंतु उन्हें यह ज्ञात हो कि लेखन का प्रकार कोई भी हो, वह कालखण्ड  का आधिकारिक बयान होता है । पैरोडीकारों को पैरोडी के शास्त्रीय निहितार्थों को अच्छे से समझना होगा ,तब ही 'पैरोडी की मेलोडी' फॉरएवर रहेगी ।

संजय झाला
www.sanjayjhala.com

स्रोत:-
परसाई रचनावली
श्री रविंद्र नाथ त्यागी
 श्री वरुण चतुर्वेदी
श्रीआशकरण अटल
श्री अरुण जैमिनी
 श्री पदम अलबेला

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