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रस और उनका क्रम

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जानें... जीवन के 'रस' और उसके 'क्रम' को 'अष्टौ नाट्ये रसा: स्मृता:' भरत मुनि ने आठ रसों का ही उल्लेख किया है । इसी के आधार पर महाकवि कालिदास भारवि और दंडी ने भी इन्ही 8  रसों  का ही प्रतिपादन किया है । भरत मुनि ने इन रसों का क्रम भी निर्धारित किया है, १. शृङ्गार, २. हास्य, ३. करुण, ४. रौद्र, ५ वीर, ६. भयानक, ७. बीभत्स और ८. अद्भुत-नाटक में ये आठ ही रस माने जाते हैं । रति या काम न केवल मनुष्य जाति में अपितु सभी जातियों में मुख्य प्रवृत्तिके रूप में पाया जाता है और सबको उसके प्रति आकर्षण होता है, इसलिए सबसे पहले शृङ्गार को स्थान दिया गया है। हास्य शृङ्गार का अनुगामी है, इसलिए शृङ्गार के बाद हास्यरस को स्थान दिया गया है। हास्य से विपरीत स्थिति करुणरस की है। इसलिए हास्यके बाद करुणरस को स्थान दिया गया है। अपने प्रियतम बन्धुके वास्तविक विनाश या भ्रमवश ही उसके विनाश का निश्चय हो जाने के बाद करुणरस की सीमा प्रारम्भ होती है, उसमें पुनर्मिलनकी आशा नहीं रहती है। अतएव करुणरस नैराश्यमय होनेसे निरपेक्ष-रस माना जाता है। भवभूतिने 'तटस्थं नैराश्यात्' कहकर करु...

धर्म और सनातन धर्म का सार

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यह है 'धर्म और सनातन धर्म' का सार...हम कितने 'धार्मिक' और कितने 'सनातनी??😊 1.महर्षि वशिष्ठ :-शिष्ट महापुरुष जो आचरण करते हैं ,वही धर्माचरण के रूप में प्रमाण मानने योग्य है । 2 महर्षि मनु:- मनु ने आचार को कर्तव्य बताया है। उन्होंने इन दस तत्वों को धर्म कहा है। धृति( धैर्य- संतोष), क्षमा (दूसरे के अपराध को सह लेना- अपराधी को माफ करना), दम (मन को निर्विकार रखना), अस्तेय (दूसरे की वस्तु की याद नहीं करना ), शौच( शरीर को शुद्ध रखना) इंद्रिय निग्रह (जितेन्द्रियता), धी (भलीभांति समझना) विद्या, सत्य और अक्रोध ( क्रोध का कारण होते हुए भी क्रोध नहीं करना) इनको धर्म कहा है । 3 वेदव्यास:- दान ही धर्म है। 4 महर्षि आपस्तंब :-उत्तम आचरण ही धर्म है। जिसका आचरण ही खराब है, वह कोई धर्म नहीं कर सकता । 5 पाराशर स्मृति:- जो मनुष्य आचार से भ्रष्ट है, उनसे धर्म विमुख हो जाता है । 6 अत्रि स्मृति:- योग ही सर्वोत्कृष्ट धर्म है। 7 मार्कण्डेय स्मृति:- अहिंसा ,सत्य और सदव्यवहार ही धर्म है। 8 दक्ष स्मृति:- अतिथि सेवा ही धर्म है। 9 विश्वामित्र स्मृति :-उचित समय पर नैमित्तिक कार्य ही धर्म है । 10 ...

टंग-ट्विस्टर

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'टंग -ट्विस्टर' अर्थात् सीधे-सीधे शब्दों में समझा जाए तो इसका अर्थ जिह्वा/ जीभ भाँजना -घुमाना -मरोड़ना है।  और अधिक  सरलता से  इसे परिभाषित किया जाए तो  इसे 'जिह्वा का  लयात्मक व्यायाम' कहना उपयुक्त होगा , ऐसा व्यायाम जो जिह्वा के माध्यम से उत्पन्न होने वाले शब्द- ध्वनि को अत्यंत सुस्पष्ट- शुद्ध -ग्राह्य -प्रभावी और चमत्कारी बनाता है ।  बहुत कम लोग हैं जो इसकेशारीरिक- वैज्ञानिक महत्त्व के साथ इसका शास्त्रीय महत्त्व भी जानते हैं । काव्यप्रकाश रचयिता आचार्य मम्मट काव्य भेद  को स्पष्ट करते हुए 'चित्र काव्य'  की व्याख्या करते हैं। चित्र काव्य को काव्य का तीसरा भेद भी कहा गया है । आचार्य मम्मट कहते हैं कि व्यंग्य और अर्थ से रहित शब्दों का अनुप्रास जन्य चमत्कार ही चित्र काव्य है । इस काव्य में शब्द सौंदर्य तो होता है, किंतु यह काव्यतत्त्व से विहीन होने के कारण अधम कोटि का काव्य माना गया है । उदाहरण स्वरूप(हिंदी में)  "चार चोर  चार छाते में चार चार अचार चाटे चाट चाट कर छाता चुराकर भागे" प्रथम दृष्टया यह अनुप्रास है। आचार्य रामचंद्र वर्मा ने इसे ...

पुलिस का डंडा,वाद्ययंत्र और पर्सनल सेंगोल

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पुलिस का डंडा- वाद्ययंत्र और 'सेंगोल'😊😊 पुलिस का 'डंडा'( दंड ) एक विशेष प्रकार का 'वाद्य यंत्र' है, अर्थात बजाने का 'बाजा' है । पुलिस जब यह 'दंड वादन' करती है, तो अपराधियों के शरीर में स्थित दृश्य और अदृश्य छिद्रों में से विभिन्न प्रकार की राग-रागिनियाँ निकलती हैं ।😊😊 पुलिस महान संगीत प्रेमी होती  है । वह भिन्न-भिन्न मुद्राओं में इस वाद्य यंत्र को 'बजाती' है और  'गाती' है । इस प्रकार प्रायः वह गाती-बजाती है। शांतिपूर्ण चुनाव के लिए पुलिस ने भारी मात्रा में 'डंडों' की खरीद की है, नेताओं ने 'गुंडो' की और पार्टियों ने 'झंडो' की । डंडा पुलिस वालों पर्सनल 'सेंगोल'( संसद में स्थापित धर्म दंड ) यह 'दंड' शासन में दुशासन को भी अनुशासन में रखता है । डंडा धर्मरक्षक और धर्मनिरपेक्ष है । डंडा त्वचा और हड्डियों से स्नेह मिलन के समय 'जाति' और वर्ग नहीं देखता । डंडा जब 'नश्वर' शरीर से मिलता है ,तो घोर नास्तिक को भी 'अल्लाह' और 'ईश्वर' का 'सस्वर' स्मरण  कराता है। क...

नियति ,नेता ,भूसे का पर्वत और गेंहूँ के दाने

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'चुनाव' में 'दो' अच्छे लोग 'ढूंढ़ना' 'भूसे' के पर्वत से दो दाने गेहूँ के 'ढूंढने' जितना ही कठिन काम है  😊। प्रत्याशी 'दो' प्रकार के होते हैं, एक 'अधिक बुरा'  दूसरा 'अत्यधिक बुरा' ; दोनों में से 'कम बुरा' चुनना ही हमारी 'नियति' है,(जो 'स्त्रीलिंग' शब्द है) और 'नियति' का पुल्लिंग 'नेता' है। 'नियति' और 'नेता' के बीच वोटर 'उभयलिंगी' होकर अंततोगत्वा पाँच वर्षों के लिए 'नपुंसक लिंग' में परिवर्तित हो जाता है ।😊😊😊 #poetry #shorts #humour #satire #politics#rajasthan#chhattishgarh#madhypradesh#telangana#mizoram #assembly #elections#voter#candidate#kavisanjayjhala

चरित्र और आईने

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'चरित्र' और 'आईने 'हर स्थिति में साफ होने चाहिए क्योंकि कल आपके बच्चे उसमें अपना चेहरा देखेंगे आईना 'सच' का पैरोकार नहीं, 'सच' का पर्याय है । धृतराष्ट्र भी 'आईना' देखना चाहता है। उसका आईना  'संजय' है। कदाचित आईने का एक पर्याय संजय भी है । वह भी धृतराष्ट्र को सच दिखाता है, लेकिन लोभ -मोह  की धुंध ने उस सच को अनदेखा किया । मैं कई बार कहता हूँ, पत्रकारिता/मीडिया का आदर्श 'नारद' नहीं, संजय होना चाहिए; क्योंकि संजय तटस्थ और निष्पक्ष है ,आईने की तरह । आईना 'चेहरों' से कोई  समझौता नहीं करता, फिर वह चेहरा 'युधिष्ठिर' का हो या 'धृतराष्ट्र' का । पर आज.... आपको ऐसा नहीं लगता कि आईनों के भी अपने गुप्त एजेंडे हैं !!!!!! ख़ैर ..आईने और संजय की जुगलबंदी😊 तस्वीर सौजन्य:भ्राताश्री अरुण जैमिनी💐 #poetry#sahitya#humour#satire#viral#shorts#aaina#media#patrakarita#kavisammelan#kavisanjayjhala

हास्यम्-लास्यम्😊

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पजामा- 'नाडा' और क'नाडा'😊😊😊 कनाडा ने खालिस्तानी आतंकवादी निज्जर की आत्मा को परमात्मा से मिलाने का आरोप भारत सरकार पर मढ़ दिया । भारत सरकार ने भी आनन-फानन  में कनाडा सरकार के 'सर' पर 'कार' चलाने का मूड बना लिया और अब भारत सरकार कनाडा के पाजामे का 'नाडा'( मालवा के कवि मित्रों से साभार)😊😊 उसी प्रकार खोल रही है, जैसे पुरुष प्रकृति के भेद और बंधन खोलता है। अच्छी बात है... 👍 धूमिल के शब्दों में क्षमा के साथ कहूँ तो आज वैश्विक राजनीति में भी हिजड़े 'लिंगबोध' की बात करते हैं और गणिकायें 'आत्मशोध' की ।  कौवे भी इस फिराक में रहते हैं कि कब  हंसों  को कोढ़ी कहने का मौका मिले । वैसे क्या दिक्कत है....? यदि भारत सरकार यह गर्व से कहे कि कश्मीर और खालिस्तान की बात करने वालों की सुपारी हम ही यमराज को देते हैं । लेकिन भारत के संस्कार हैं कि वो शत्रुओं की भी लंबी आयु की कामना करता है , 'जीवन्तु मे शत्रुगणा: सदैव' वैसे भारत को अमेरिका की रीति-नीति अच्छे से समझनी होगी, क्योंकि यथा समाचार निज्जर की हत्या की सूचना एफ बी आई ने ही कनाडा को दी...

तत्र ही 'क्यों'रमन्ते देवता😊😊?

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  यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, तत्र ही 'क्यों' रमन्ते तत्र देवता:??😊😊😊 अब तक हम सुनते आए हैं कि महिलाओं की 'दिल' से इज्जत करनी चाहिए । आज से हम 'बिल' से इज्जत करेंगे । यह जानने योग्य है कि जिस देश में सावित्री, अदिति, लोपामुद्रा ,अपाला और घोषा जैसी महिलाएँ वेद मंत्रों  की दृष्टा के रूप में देवताओं के लिए भी पूजनीय रही है, उस देश में नारी सम्मान के लिए अधिनियम लाया गया है । वेदों ने स्त्री- पुरुष, दोनों को शासक चुनने एवं युद्ध में भाग लेने की स्वीकृति-अधिकार दिया है ।महिलाओं को समान शिक्षा अधिकारी और पुरुष के धन ,बल ,यश और कीर्ति  का कारक माना है  । उस नारी शक्ति के वंदन  के लिए अब हम 'एक्ट' के थ्रू 'रिएक्ट' करेंगे।  वैसे हमेशा पुरुषों ने महिलाओं को आगे बढ़ाया है। जब भी बस- सिनेमा- रेल की लाइन लंबी होती है, तो पुरुष उदारतापूर्वक टिकट लेने के लिए महिलाओं को आगे बढ़ा देता है।😊 कहीं ऐसा तो नहीं कि फिर इन पुरुषों ने षडयंत्र पूर्वक उन्हें लोकसभा- विधानसभा का टिकट लाने के लिए आगे बढ़ा दिया हो । हे नारियों,इन नारों; क्षमा से करें पुरुषों से सावधान रहने ...

कवि-कविता और कवि सम्मेलन का इतिहास

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कवि -कविता और कवि सम्मेलन का इतिहास वेद को 'देवों का अमर काव्य' कहा गया है--"देवस्य पश्य काव्यं न ममार न जीर्यति'के वैदिक वचन में देव के काव्य के रूप में वेद का ही निर्देश किया गया है और वेद के निर्माता परमात्मा के लिए वेदों मेंअनेक जगह 'कवि' शब्द का प्रयोग किया गया है। इसलिए वेद स्वयं काव्यरूप है और उसमें काव्य का सम्पूर्ण सौन्दर्य पाया जाता है। इसलिए साहित्यशास्त्र में काव्य सौन्दर्य के आधायक जिन गुण, रीति, अलङ्कार, ध्वनि आदि तत्त्वों का विवेचन किया गया है ,वे सभी तत्त्व मूल रूप में वेद में पाये जाते हैं। वेदों में रचनाके माधुर्य, ओज और प्रसादादि गुणों के उदाहरण अनेक स्थानों पर पाये जाते हैं। गुणों के आधार पर ही रीतियों का निर्धारण होता है। इसलिए रीतियों के उदाहरण भी वेद में खोजे जा सकते हैं। उपमा और रूपक आदि अलङ्कारों की तो वेदों में भरमार है। कवि शब्द का प्रथम प्रयोग इंद्र के लिए हुआ है और उसे असीम ओजस्वी युवा कवि के रूप में वर्णित किया गया है। 'युवा कविरमितौजा अजायत' । ऋग्वेद १-११-४ कवि की तुलना प्रजापति ब्रह्मा से की गई और कहा गया- अपा...

हिन्दी दिवस विशेष

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हिन्दी ने अपनी 'माँ' संस्कृत से ग्रहण किया गुण-धर्म और स्वरूप यह सुस्थापित सत्य और तथ्य है कि हिंदी भाषा की आदि जननी संस्कृत है । संस्कृत,पाली,प्राकृत और  अपभ्रंश  जैसे भाषाई महासागर में अवगाहन करती हुई हिंदी आज दुनिया की दिव्य सौंदर्यमयी  और परिष्कृत भाषा के रूप में  प्रकट हुई है । हमें यह भी जान लेना आवश्यक है कि भारतीय भाषाओं में (उर्दू या आधुनिक कश्मीरी जैसी भाषाओं को छोड़कर) 50 से 80% शब्द पहले से ही संस्कृत से आए हैं, यह भी सर्वथा सत्य है । भारत की संविधान निर्मात्री सभा में  इस बात पर विवाद हुआ कि संस्कृतनिष्ठ हिंदी से उर्दू भाषी तथा अन्य वर्गों को कठिनाई होगी। इसलिए उन्होंने उर्दू मिश्रित हिंदी का एक आंदोलन शुरू किया और उस हिंदी को 'हिंदुस्तानी' नाम दिया। जिसका विरोध श्री पुरुषोत्तम दास टंडन और सेठ गोविंद दास जैसे विद्वानों ने किया और हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का अभियान छेड़ा और परिणाम स्वरुप 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने निर्णय दिया कि भारत की राजभाषा हिंदी होगी ,'हिंदुस्तानी' नहीं। संविधान के अनुच्छेद 351 में स्पष्ट किया गया कि हमारे द्वारा स्...

....अंतिम दिनकर

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पहले वीर रस के बारे में -----------–------------- शृंगारहास्यकरुणरौद्रवीर भयानका: । वीभत्सादभुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्येरसा:स्मृताः । रसों का यह क्रम आचार्य मम्मट ने भरत- नाट्यशास्त्र से ज्यों का त्यों उतार लिया है, और रसों का यही क्रम निर्धारित किया है । इसमें वीर रस पांचवे स्थान पर है। इन रसों के अंत में, यद्यपि इसकी गणना यहाँ नहीं की गई; किंतु निवृत्ति धर्म प्रधान, मोक्ष दायक 'शांत रस' आता है । यह ज्ञातव्य है कि महाकवि कालिदास, भामह और दंडी ने भी भरतमुनि के "अष्टौनाट्येरसा:स्मृता:" स्वीकार किया है। रस कोई भी हो अथवा किसी भी रस की कविता हो, उसकी अपेक्षा "सद्य: परनिवृत्ति"- अलौकिक आनंद अनुभूति या रसास्वादन ही काव्य का मुख्य प्रयोजन है । कवियों को यह जानना चाहिए, विशेष रूप से वीर रस के कवियों को कि' कवि' शब्द का पहला प्रयोग देवराज इंद्र के लिए हुआ है। उन्हें असीम 'ओजस्वी युवा कवि' के रूप में वर्णित किया गया है । 'युवकविरमितौजा अजायत:' ऋग्वेद-१-११-४ वीर रस का वर्ण 'स्वर्ण' अथवा 'गौर' कहा गया है । भानुदत्त के अ...

दुष्यंत ने ग़ज़ल को 'शस्त्र' और दीक्षित दनकौरी ने 'शास्त्र' बनाया

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मैं ग़ज़ल शब्द के अर्थ, भाषा, उत्पत्ति,व्युत्पत्ति या निष्पत्ति के बारे में बता कर कोई पुनरावृति नहीं करूंगा अथवा ग़ज़ल में प्रेमी व प्रेमिका के मध्य प्रेम दशाओं में; अनुनय, विनय, मिलन, वियोग, जलन, पीड़ा, उपालंभ को भी विश्लेषित नहीं करूंगा । ग़ज़ल क्या दुनिया की कोई भी लेखन विधा हो, वह प्रेम की विधि -विधान, रूप -स्वरूप और प्रक्रिया से अछूती नहीं रही । प्रेम की इन दशाओं पर 'शास्त्र' लिखे गए और 'शस्त्र' चलाए गए । महाकवि दिनकर जी सही कहते हैं ," खोजता पुरुष सौंदर्य, त्रिया प्रतिभा को, नारी चरित्र बल  को, नर सिर्फ त्वचा को " इस 'चाम शास्त्र' ने ही हमें 'कामशास्त्र' दिया । कितना आश्चर्यजनक है  लोगों ने एक उम्र, एक युग, एक कालखंड महिलाओं- सौंदर्य और उनकी प्रेम- दशाओं के विश्लेषण करने में निकाल दी । इसके विपरीत किसी भी नारी ने दो लाइन लिखकर किसी भी 'नर' के सौंदर्य का वर्णन कर उसे 'नारायण' नहीं बनाया... अपितु 'नर'को 'वानर' बनाते हुए नियमित देख रहे हैं ।...अस्तु । प्रगतिवाद से पूर्व ग़ज़ल में भी लगभग यही हुआ । प्रगतिव...
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आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत पैरोडी के शास्त्रीय निहितार्थ ---------------------------- पैरोडी को हास्य की एक समृद्ध विधा माना गया है । पैरोडी अर्थात नकल-अनुकृति मिमिक्री ;शब्द, भाव, भाषा, स्थिति और ध्वनि की हो सकती है । नकल को हास्य का जनक भी कहा गया ।पाश्चात्य देशों में इसे Burlesque 'बर्लेस्क'कहा गया अर्थात साहित्य, संगीत, नाटक आदि के अंतर्गत हास्यास्पद प्रयोग । 'बर्लेस्क' इतावली  'बर्लेस्को' से निकला है , जो बदले में इतावली 'बुर्ला' से लिया गया है,जो हास- परिहास-उपहास से संबंधित है। 'बर्लेस्क' को कैरीकेचर और पैरोडी के व्यापक अर्थ में भी लिया जाता है। पैरोडी में किसी भी विशिष्ट शैली या लेखक की ऐसी हास्यास्पद नकल- अनुकृति होती है जो गंभीर भावों को हास्य में परिवर्तित कर देती है । ऑर्थर साइमन जैसे विद्वान पैरोडी के बारे में लिखते हैं कि Love-Admire and Respect  the original admiration and Laughter is the very essance of the act of art of Parody अर्थात पैरोडी में मूल के प्रति प्रेम और आदर में कमी नहीं आनी चाहिए। अच्छी पैरोडी का सौंदर्य उसकी म...

नाट्यशास्त्र और प्रो.राधावल्लभ त्रिपाठी

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भरतमुनि के अनुसार नाटक त्रिलोक का भावानुकीर्तन है । जिसमें धर्म ,अर्थ, काम मोक्ष के अतिरिक्त क्रीड़ा -कौतुक एवं सभी रस अपनी पूर्णता के साथ विद्यमान हैं । सात्त्विक प्रवृत्ति वालों के लिए इसमें धर्म है और तामसिक के लिए काम  ।इसमें दुष्ट दलन है, तो खल निग्रह भी ।  यह सामान्य व्यक्तियों के लिए 'प्रदर्शन' है, ज्ञानियों के लिए 'दर्शन' है और अज्ञानियों के लिए 'मार्गदर्शन' । इसमें सामर्थ्यवान् के लिएअनुमोदन  है, पथ भ्रष्टों के लिए प्रबोधन है,उल्लास का उद्बोधन है और आत्मा का शोधन है । कालिदास के अनुसार यह भाँति- भाँति  की  रुचि संपन्न लोगों के लिए समान रूप से अनुकरणीय  है । "नाट्यम भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकम   समाराधानम्" महाकवि कालिदास के अनुसार यह आँखों का सुंदर यज्ञ है ।"देवानामिदमामन्ति मुनय: कान्तं क्रतुं चाक्षुषम"। नाट्य शास्त्र सामान्य से असामान्य बनने की सुखद यात्रा है  ।इसके अध्ययन से साधारण व्यक्ति भी कुशल ,वाक्पटु, पंडित और थकान को जीतने वाला हो जाता है । ऐसा ही व्यक्ति अभिनेता बनने के योग्य है । "कुशला ये विदग्धाश्च प्रग...

श्रील प्रभुपाद की 125 वीं जन्म जयंती को समर्पित , आध्यात्मिक क्रांति के गाँधी श्रील प्रभुपाद

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 कृष्णकृपामूर्ति श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का पुण्य आविर्भाव 1896 ई. में कोलकाता में हुआ था । अपने गुरु श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी से 1922 में  भेंट होने और विधिवत्  दीक्षा लेने के पश्चात् उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वैदिक संस्कृति के प्रसार  और श्रीकृष्ण भक्ति को समर्पित कर दिया । उनके ज्ञान और भक्ति  मार्ग की प्रशस्ति हेतु गौड़ीय वैष्णव समाज ने 1947 में उन्हें 'भक्तिवेदांत 'की उपाधि से अलंकृत किया । 1950  में श्रील प्रभुपाद ने गृहस्थ जीवन से अवकाश लेकर वानप्रस्थ में प्रवेश किया और 1959 में उन्होंने  संन्यास ग्रहण किया। श्री राधा -दामोदर की शरण में ही उन्होंने जीवन का महनीय कार्य किया और श्रीमद्भागवत् पुराण का अनेक खंडों में अनुवाद और व्याख्या की । गुरु आज्ञा से  वे 1965 में संयुक्त राज्य अमेरिका गए । उन्होंने 60 से अधिक कालजयी ग्रंथों का प्रणयन किया और 1966 में  अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ की स्थापना की । उन्होंने अमेरिका में भारत के अध्यात्म- दर्शन- सांस्कृतिक और भक्ति दूत के रूप में कार्य किया ।  आपश्री...

चुटकला... 'चोटकला' और हास्य का मंत्र

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अंतरराष्ट्रीय चुटकला ​दिवस पर विशेष हास्य का लघुतम स्वरूप ही चुटकला है। यह लोकगीतों,  मुहावरों और लोकोक्तियों की भांति सार्वजनिक संपत्ति है। हास्य -व्यंग्य प्रधान चुटकुले में वचन  विदग्धता के साथ यमक- श्लेष जैसे आलंकारिक प्रयोग देखे जा सकते हैं। संक्षिप्तता और लघुता ही चुटकुले का वास्तविक  और श्रेष्ठ गुण होता है । चुटकले के लिए प्राय: इन वाक्यों से अधिक कहने- सुनने के लिए कुछ  उपलब्ध नहीं है। इसी आलोक में वर्तमान कालखंड में इसकी निष्पक्ष और सही विवेचना आवश्यक है । यह लोक विधा ,लोक विदों द्वारा लोक रंजन के लिए निर्मित है । यह दृष्टव्य है कि जो हास्य के कारक हैं; 'विट' ,'फेंटेसी' अलेगरी' और 'एब्सर्डिफिकेशन' यही गुण चुटकले के मूल में होते हैं । यह कहना समीचीन होगा कि भक्ति में जो महत्व, प्रभाव और लाभ बड़े  स्रोत्र अथवा स्तुति का है; वही महत्व संक्षिप्त मंत्रों अथवा बीज मंत्रों का होता है । इसी रूप में चुटकले हास्य रस के मंत्र अथवा बीज मंत्र हैं । समान रूप से लाभ, प्रभाव और गुणकारी। यह 'चुटकला' नहीं  'चोटकला' है अर्थात् एक ऐसी लेखन कला; जो 'सर...

पक्षी दो प्रकार के

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'पक्षी' दो प्रकार के होते हैं। एक सत्ता 'पक्षी'  और एक 'विपक्षी'। सत्ता 'पक्षी' पंख युक्त होता है; वो चहचहाता है। 'विपक्षी' पंख हीन होता है, वो मात्र फड़फड़ाता है और जब भी समय मिलता है, गलियाता है, लतियाता है, जुतियाता है, और घिघियाता है। यही उसका पक्षीयार्थ (पुरुषार्थ की तरह) है। यह दुनिया 'टर्मिनोलॉजी' से ही चलती है। राजनीति तो 'भाषिक छल' का ही पुण्य पर्याय है। विशेष रूप से 'सत्ता पक्षी' उनमें गज़ब की परिवर्तन क्षमता होती है, पता नहीं कब उनका मूड बन जाए और वो बुद्ध के 'शून्य' को शंकर का 'ब्रह्म' बना दें। यह उनके अलावा परमपिता  ब्रह्मा को भी पता नहीं होता। विपक्षी में भी अद्भुत सामर्थ्य होता है, जिसके डर से सत्तापक्षी एकांत में ही अपने बाप को बाप कह सकते हैं। अगर उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने बाप को बाप कहा; तो विपक्षी कहेंगे, 'केवल बाप को बाप कहना पर्याप्त नहीं है, उसे बाप मानना भी पड़ता है।' सरकार कहे कि हम अपने बाप को बाप मानने को तैयार हैं, तो विपक्षी कहेंगे; 'सरकार के लोग मौकापरस्त हैं; ये म...

नाट्यशास्त्र

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18वीं शताब्दी में कलकत्ता में सर विलियम जोन्स मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने किसी तरह संस्कृत पढ़ी और 1787 में शाकुन्तल का संपादन और अंग्रेजी अनुवाद का काम शुरु किया था। शाकुन्तल का छपना एक क्रांतिकारी घटना थी। सर विलियम जोन्स का अनुवाद जर्मनी में पहुंचा। उससे दुनिया की भारत के बारे में दृष्टि बदली और कला साहित्य और संस्कृति में बदलाव आया। इससे भारत को लेकर भारतवासियों की भी दृष्टि बदली।  उन्होंने लिखा कि अगर उन्हें नाट्यशास्त्र की पुस्तक मिल जाती तो वो और अधिक बेहतर लिख सकते थे। तब दुनिया ने नाट्य शास्त्र को खोजना शुरू किया। 19वीं शताब्दी के मध्य तक तो अनुसंधानकर्ताओं को नाट्य शास्त्र अप्राप्त ही था। भारत भर से लगभग 40 पांडुलिपियों के आधार पर नाट्यशास्त्र का प्रामाणिक संस्करण चार खंडों में 1926-1964 के मध्य बड़ौदा से प्रकाशित हुआ। नाट्य विधा को एक नया आयाम मिला।  भरत मुनि और नाट्यशास्त्र नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि हैं। उनके अनुसार संसार की कोई ऐसी कला, ज्ञान, शिल्प, विद्या, योग कर्म नहीं है, जो नाट्य शास्त्र का अंग न बन सके। नाट्य में असंख्य ज्ञान सागर समाहित हैं। नाट्य पंचम वेद ह...

वेद-शास्त्रों में हास्य

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वेद भी चुहलबाज़ी, हास्य और ठिठोली से अछूते नहीं हैं। इसका प्राचीनतम उदाहरण ऋग्वेद (10 .86) का वृषाकपि सूक्त है। इसमें तीन पात्र हैं, इंद्र -इंद्राणी और वृषाकपि। वृषाकपि इंद्र के मित्र या छोटे भाई जैसे हैं। कहा गया है कि 'उपेंद्रहरो विष्णुवृषाकपि: (3.3. 130) वृषाकपि की पत्नी का नाम वृषाकपायी है। अमरकोश के अनुसार वृषाकपायी लक्ष्मी -पार्वती का ही एक पर्याय है।( 3.3 156)। देवर- भाभी के मध्य पारस्परिक हास्य और चुहल की परंपराएं यहीं से प्रारंभ हुईं। वृषाकपि इंद्राणी (भाभी) को शब्दों से चिढ़ाता है, तो इंद्राणी कहती है, "यह शैतान है, हिंसक है ...मुझे अवीरा अर्थात तू तो स्त्री ही नहीं है...कहता है "मेरा मन करता है कि वराह का पीछा करने वाला कुत्ता इसके कान काट कर ले जाए। इंद्र हंसते हुए इंद्राणी को समझाते हैं। कहते है, "यह अबोधबालक है, नासमझ है, पर मन का बुरा नहीं है। मुझे यह और इसकी पत्नी वृषाकपायी अत्यधिक प्रिय है। तुम इस पर क्रोध मत करो। इस प्रकार वृषाकपि और इंद्र का साहचर्य ऐसा ही है, जैसे संस्कृत नाटक में नायक और विदूषक का। कुछ वैदिक अनुष्ठान ऐसे हैं, जिनमें हास्य आवश्यक अ...

शरद जोशी जी की जयंती (21 मई) के अवसर पर... हास्य-व्यंग्य का पहला 'शो-मैन'

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शरद जोशी, अर्थात् मालवा के मध्यमवर्गीय परिवार का वह व्यक्ति ;जिसने साहित्यिक मान्यताओं में 'झोपड़पट्टी 'का दर्जा रखने वाली व्यंग्य विधा को साहित्य में 'व्हाइट हाउस' जैसी 'शक्ति 'बना दिया ।उन्होंने  होनोरे  डी बाल्ज़ाक ,सामरसेट,   टॉलस्टाय, 'ओ 'हेनरी, कृष्ण चंदर ,मंटो ,शरत्, रवींद्र आदि को जी भर के पढ़ा  । उन्होंने  ब्रह्मा की तरह नए पात्रों और  चरित्रों का निर्माण किया और उनसे मनचाही क्रीड़ा की ।  सृजन के लिए उन्हें जिस चीज़ की जरूरत  होती थी, वह थी; थोड़ी धूप ,ठंडी हवा, बढ़िया काग़ज़ और एक ऐसी कलम, जो बीच में ना रुके और साथ में एक -आधा कप चाय भी । यह एक कालजयी रचना की गारंटी थी  ।वे दरबारों  को दूर से  ही हाथ जोड़ते थे, और मौका आने पर दो-दो हाथ भी करते थे। एक फिनोमना होने के बावज़ूद उन्होंने एक आम आदमी का आदर्श जीवन चुना  ।वह आम आदमी; जो देश के सुख- दुख में बतौर नागरिक हिस्सेदारी करता है, रोटी कमाता है ,बच्चे पैदा करता है, लाइन में लगकर टिकट खरीदता है, हंसता है -हंसाता है ,यात्राएँ करता है और यह जानते हुए भी कि साहित्य कोई पढ़ता ...